खेल एक गाढ़ा मगर अपने में कुछ हल्का करने वाला शब्द है। कई लोग अक्सर खेल-खेल में बड़े से बड़े काम कर जाते हैं, जबकि दूसरे कई लोगों के लिए ये काम ठोस रूप में होते हैं। ये सब तभी होते हैं, जब आप अपने हुनर के साथ उस काम में शामिल होते है या अपने रियाज़ का आधार बनाते हैं। खेल की अपनी भाषा होती है, खेल उम्र पहचानता है, खेल लिंग भी जानता है और इसे चुनाव भी पता हैं। खेल बच्चो की दुनियाँ की देन है पर कॉमनवैल्थ में खेले जाने वाले ये खेल किसी टकराव में है हार-जीत में है जो बच्चे नही समझते। यहाँ ये खेल किसी चीज को पाने के लिए है पर बच्चो के खेल किसी चीज़ को पाने के लिए होते सिफ्र अन्नद के लिए होते है।
क्या कॉमनवेल्थ गेम्स में उन खेलों को शामिल किया जाएगा जो गली, नुक्कड़ और छतों की खूबसूरती बन चुके हैं। क्या ऐसे खेल वहां खेले जाएंगे, जो बच्चो की मासूम छुअन से होकर गुजरते हैं। क्या इन खेलों को वहां जगह मिलेगी? अगर नहीं तो इन खेलों का होना खास क्यों?
ऐसे कितने लोग हैं जो ग्यारह दिनों के इस खेल आयोजन से जुड़ने के लिए बेकरार हैं? इन सवालों पर सोचते
हुए कुछ जीवन उभरे।
जब आप छोटे बच्चे होते हैं तो अपकी करी गई हर हरकत आपके संर्दभ में रहने वालो के लिए खेल बन जाती है ।
जब आप बड़ हो जाते हो और इस जीवन को जी रहे होते हो ।
जब आप मैच्योर होते हो तब आपके लिए वो रियाज़ बन जाता है ।
जब आप बुढ़ापे की और होते हो, तब ये सब खेल यादो में समाकर यादे बन जाती है या कहानियों किस्सो में बाहर आने को उतारु रहती है । ये सब पता नही एक रुप रेखा ही है या कुछ और पर कही ना कही ये बहाव में रहा है ।
खेलो का जीवन क्या होता हैं? जहां तक में सोचता हुँ खेलो का जीवन किसी ठहराव में नही हैं, बस ये बदलाव में रहे हैं। जो आप नही खेलोगे तो कोई और खेलेगा। कुछ लोग अपने तनाव को दुर करने के लिए खेल खेलते है जहां तनाव कुछ समय के लिए थम जाता हैं। ये सब कुछ हल्का करने की दिशा में होता हैं। जहां ये प्रक्रियां आपको तनाव से बाहर खीच लाती हैं और तनाव को तोड़ने का रुप होती हैं।
हम भी चाहते हैं हमारे बीच कॉमनवेल्थ गेम्स हो मगर एसे नही जहां हमारी भुमिका सिफ्र और सिफ्र एक दर्शक की हो बल्की ऐसा हो जहां हम भी शामिल हो ।
गली माहौल्ले के कुछ खेल (Local Games)
छुपन-छुपाई, पकड़ा-पकड़ी, पाली, गिट्टे, ऊँच नीच का पापड़ा, पीट्ठु गरम, बरफ-पानी, पैल्लो-दुग्गो, मारम-पीट्टी, खो-खो, लगंड़ी टाँग का पाला, लट्टु, कंचे, रस्सा, गिल्ली-डन्डा, आँख में चोली, अन्ताकक्षरी, चैन, कबड्डी, कटी-पतंग, लोहा-लक्कड़, चोर-पुलिस, चिड़ियाँ-उड़ी, पोसम-पा, कैरम, लुड़ो, अष्टाचक्कन, माचिस-कार्ड, विड़ियो-गेम,,तीन-गोटी, चिड़ी-बल्ला, लास्टिक, टॉयर, लंगड़, फ्रिस्बी, चिब्बी, बोल मेरी मछली कितना पानी,
मुर्ति घुम-घुम, चार-पर्ची, सौला-पर्ची, झुला...
Saturday, August 28, 2010
Monday, August 16, 2010
सुलागता माहौल...
सारी रोशनी अंधेरे में तब्दिल हो चुकी थी। सभी अपने सरियानो को समेटे हुए अपने अपने सपनो में खोये हुए थे और कानो में सिर्फ झिंगुरो के टरराने की आवाज़ गूज रही थी। एक तरफ आँखौ में निंद अटखेलिया कर रही थी और दुसरी तरफ बदन चादर में लिपटा हुआ करवटो पर करवट बदल रहा था। इतने में आवाज करती हुई हल्की सी रोशनी उठी। जब तक करवट बदलकर देखा तो तब तक वो रोशनी चिंगारी में तब्दिल हो चुकि थी।वो चिंगारी एक हल्के धुए के साथ तेज होती और हल्के धुए के साथ ही फिकी पड़ जाती। ये लाल रंग की चिंगारी एसा लग रहा था, किसी गहरी सोच में खोई हुई है। ना जाने कितने ही सावालो को अपने अन्दर घुट-घुट कर घोले जा रही है।बस ये रोशनी चिंगारी के साथ कम तेज हुए जाती, और सोच को गहरा किये जाती।
अंधेरे में सिर्फ वही चिंगारी थी जो रोशनी बटोर रही थी। चिंगारी धुए के साथ सुलगते हुए आस-पास के थोड़े हिस्से को अपने रंग में समा लेती। जहां चेहरे का थोड़ हिस्सा भी उसी रोशनी में नज़र आता। बस चिंगारी सुलगती तो एक गहरी सांस के साथ धुआ निकलता और चंद लम्हो के बाद दोबारा चिंगारी सुलग उठती। ये किसी का शौकियाना धुआं उठाना नही था। इसके साथ किसी की चिन्ताए, किसी कि सोच झलक रही थी।जो धुए के साथ उठने कि कोशिश में थी। मगर ये कोशिश कुछ समय बाद चिगारी के खत्म होते ही बन्द हो जाती और धुआ सांसो को गर्म कर देता।और उस चिंगारी के बुझते ही समा फिर कही अधेंरो में खो जाता। जहां आकारो के अलावा किसी चीज को समझ पाना मुशकिल था।
अंधेरे में सिर्फ वही चिंगारी थी जो रोशनी बटोर रही थी। चिंगारी धुए के साथ सुलगते हुए आस-पास के थोड़े हिस्से को अपने रंग में समा लेती। जहां चेहरे का थोड़ हिस्सा भी उसी रोशनी में नज़र आता। बस चिंगारी सुलगती तो एक गहरी सांस के साथ धुआ निकलता और चंद लम्हो के बाद दोबारा चिंगारी सुलग उठती। ये किसी का शौकियाना धुआं उठाना नही था। इसके साथ किसी की चिन्ताए, किसी कि सोच झलक रही थी।जो धुए के साथ उठने कि कोशिश में थी। मगर ये कोशिश कुछ समय बाद चिगारी के खत्म होते ही बन्द हो जाती और धुआ सांसो को गर्म कर देता।और उस चिंगारी के बुझते ही समा फिर कही अधेंरो में खो जाता। जहां आकारो के अलावा किसी चीज को समझ पाना मुशकिल था।
Wednesday, July 7, 2010

ड़ायरी
कितने लोग अपने जीवन में होने वाली घटनाओ किस्सो कहानियों, कविताओ, शेरो-शायरियो को अपने जीवन की यादो से एक पन्ने पर उतार देते है। पर क्यो? उन यादो किस्सो कहानियो को डायरी पर उतारना क्यो जरुरी हो जाता है? कई शक्स ऐसे भी होते है जो की वो जो बात लोगो से बाँट नही पाते वो इसे अपनी डायरी का हिस्सा बना लेते है । लोग कई तरह से अपनी ड़ायरीयो को संजोते है । कोई गानो से तो कोई केख कविताओ से कोई अपनी यादो से संजोते है तो कोई महीने का राशन पानी दर्ज करता है तो कोई शायरी के भारी भारी और अनौखे शब्दो से इसकी सुन्दरता पर चाँद तारे लगा देता है । पर अज एक अनोखी ड़ायरी मेरे पास है है तो उसमे भी शेरो-शायरी मगर एक अलग अन्दाज़ में ।
कितने लोग अपने जीवन में होने वाली घटनाओ किस्सो कहानियों, कविताओ, शेरो-शायरियो को अपने जीवन की यादो से एक पन्ने पर उतार के ड़ायरी को एक जीवन दे देते है । पर क्यूँ ? ड़ायरी शब्द सुनकर ही एक भारीपन का एहसास होता है पर क्यूँ अगर मैं ये कहुँ की मैने अपनी यादो को एक कोपी में उतारा है । तो शायद उस लिखे हुए को सुनने में भी किइ दिलचस्पी नही रहती पर अगर मैं कोपी कि जगह ड़ायरी को जोड़ देता हुँ तो शायद अपने आप में एक वजन लगता है एसा क्यूँ शायद ब़ायरी और कोपी मे कापी अन्तर हो जाता है । ड़ायरी एक भारी कलपनाओ की और मुझे आकर्षित कर ले जाती है । जहाँ कई किस्से-कहानियाँ, बरसो से लिखा गया आरकाईव, बहुत दिनो से कैद हुए हजारो-लाखो शब्द जो अपने वजन को दो परतो के बीच छुपा लेते है ड़ायरी को समझने के लिए काफी है या नही है ये पता नही ।
पर हाँ आज एक ऐसी ही ड़ायरी मेरे हाथ लगी संजय भाई सहाब कितने ही दिनो से अपने बीच हमेशा घुमने और दिल को छू जाने वाली शायरी को अपनी कलम की कभी मोटी कभी बारिक लिखाई से अपनी ड़ायरि के पन्नो में पिरोते है । कई ड़ायरिथा भर दी उनहोने शायद दो या तीन पर उनका कही पता नही की अब कहा किन कागजातो के साथ अपने खुबसुरत और बनावटी शब्दो के साथ कहा दफन हो गई है । कभी ढूंढने की कोशिश भी नही कि, पर हाँ जो उसकी नज़रो के सामने थी वो उसे अपने दोस्तो, रिश्तेदारों और भाईयों के साथ बैठकर पड़ता । मज़ा बहुत आता था उसे पड़ने में पर वो शायरी उनकी नही थी । बल्की उनकी ज़िन्दगी में रिजाना आने-जाने वाली शायरियों में से एक थी जो वो कभी दोस्तो के साथ लतिफा समझ कर सुना देता । पर लगता की अब वो इसे अपने और हमारे बीच सुनाकर उन्ही यादों को पुखता कर लेता या दोहरा लेता । अक्सर मुझे वो बाताया करता कि देख ये पड़ अच्छी है । मैं बोलता यार तु ही सुना दे मज़ा आएगा ।
वो अपने शायरी भरे अन्दाज़ में ...
" कभी दिल तो कभी शमा जला के रोए,
तेरी यादो को सीने से लगा के रोए ।
रात की गोद में जब सो गई दुनियाँ सारी ,
तो चाँद को सीने से लगा के रोए ।।
मै वाह-वाह कहकर चुप हो जाता और वो मेरी निगाहो को देखकर अपनी डायरी में लिखे दुसरे मज़ेदार शेरो-शायरी को तलाशने लगता पर कही न कही असकी आवाज़ में वो झलक ही जाता जो अपनी शायरी में वो कह गया था । और मुझे मालुम भी नही पड़ने दिया । मुझे लग रहा था कि शायद इसे अपना दर्द बाटने वाला चाहिए और मैं बोला अबे एक ही सुना के रह गया और नही सुनाएगा क्या । वो कहता रुक, कोई दिल छु जाने वाली शायरी या गज़ल मिल जाए तो अभी सुनाता हुँ । तो मैं कहता चल मैं सुनाता हुँ...
वो बोला ईरशाद-ईरशाद...
दो कदम का फासला अब सहा न जाएगा ,
यादों के सहारे अब रहा न जाएगा ।
हो जाओगे मजबूर हमारी चाहत में ,
की एक पल हमारे बजैर जिया न जाएगा ।।
वो वाह-वाह करता हुआ बोला यार तू यो बहुत बढियां शायर है । मैने कहा हाँ यार बस तेरे साथ रहते रहते बन गया । बस यूँ ही हसी नजाक में वो मुझे कई शायरी सुना देता और सुनाते-सुनाते हम बातो बातो मे नींद की आगोश में सौ जाते...।
सामुहिक ठहराव के दो पल...
सामुहिक ठहराव के दो पल...
निजी सामुहिक में कब तबदिल हो जाता है पता ही नही चलता...
जीवन में सामुहिक जगह आपनी जगह आपना आस्तित कब बना लेती है पता ही नही चलता।धीरे-धीरे ये सामुहिकता एक ठोस रुप बनाती हुई जटीलता कि और कब कदम बना लेती है पता ही नही चलता। इसका अपना एक स्वतन्त्र आकार बनता चला जाता है। जो एक खूले मंच की तरह है। जहाँ सभी की आवाजाहीके अपने मायने होते है। और सभी का अपने अंदाज में बहना इसे और सुन्दर बना देता है। तहाँ सभी की चहलकदमी का अपना ही अंदाज होता है। हर किसी की चहलकदमी इसे एक नए सुप का आकार देती है। आर इसमे शामिल हो जाती है।
कई साल पहले एक बंजर जमीन पर इटो से एक आक्रति बनाने का काम चला और कुछ ही समय में इसने एक ठोस रुप लिया और कुछ लोगो ने आपनी आवाजाही से उसे मकान के रुप में ढाल दिया । ये मकान उस सामय बना था जब आँखो को दुर दुर तक ले जाने पर भी कुछ इका-दुक्का ही मकान दिखाई देते थे। वो भी साफ तौर पर नज़र आने में असर्मथ थे। कई किलोमीटर में गिनेचुने मकान ही दिखाई देते थे, ना कोई मकान और ना कोई दुकाने अगर थी भी तो काफी दुर जाना पढ़ता था । वहाँ रहने वाले कुछ लोग दैनिकता की हर चीज से परेशान थे, सभी चीजे उसकी पहुँच से बाहर थी। एसे में पानी की तंगी अलग । इस जगह बसावट बनाने वाले सभी लोगो को पता नही कहाँ कहाँ से पानी का जुगाड करना पढता था।
ऐसे में उस मकान में बसने वाले लोगो ने अपने घर की अधुरे बने मकान के बचे हए हिस्से पर एक हाथ से चलने वाला हैड पम्प लगवा लिया। ये उन्होने अपनी सुविधा के लिइ लगवाया था जिससे उन्हे कही और पानी के लिये नही जाना पड़े। इस हैड पम्प को उन्हिने अपनी सुविधा के लिए लगवाया था जो नीजी था। इससे उनकी परेशनी तो खत्म हुई पर लोगो ने भी वहा पानी भरना शुरु कर दिया। और धीरे-धीरे सभी लोगो को पानी भरने के लिऐ इस जगह का पता चल गया। अब यहाँ इस मकान के सामने हर समय कोई ना कोई पानी भरने के लिए अपने बर्तन लगाए रखता है। यहाँ ये नीजी से कब तबदिलियो में आकर सामुहिक बन गया पता नही चला। समय बितने के साथ साथ उनके आस पास का आकार भी बढ़ता गया, और आस पास मकानो के समुह ने जगह को भर दिया। गाँव के सभी लोग यहां आकर अपने दैनिक इस्तेमाल के लिए पानी भरा करते थे। और पानी भरते - भरते इद दौर के बीच आपस में कुछ इधर उधर की बाते भी हो जाती। एसा लगता की लोग अपने लिए समय निकालने आते हो। पुरे दिन मे कुछ समय एसा होता जब वो समाजिक हो जाते और सामाजिकता को जीने लगते। पर समय की तबदिलियो के साथ साथ एसे सामुहीक ठिकाने और बने जहाँ लोगो ने एसे ही हाथ से चलने वाले हैड पम्प और लगवा लिये कुछ घरो की चार दिवारी में नीजी ही रह गये और कुछ सामुहीक बनते चले गये। पर ये जगह धीरे धीरे चार दिवारी में सिमटने लगी सभी धीरे धीरे इसे अपने घरो मे करने लगे। पानी कि इस परेशानी को देखते हुए कुछ जगहो पर सरकारी हैडपम्प भी लगवाए पर ये ज्यादा दिन तक नही चलपाये क्योकी यहाँ पर देखबाल करने वाला कोई नही था। और ना ही इसके इस्तेमाल पर किसी का प्रतिबंध था ये जगह पुणतह: सामाजिक थी । जहाँ किसी के लिए रोक टोक की गुंजाइश नही थी सभी अपनी मर्जी के मालिक थे। ये जगह जब तक रह सकती थी रही बाद में इनका सिर्फ आकार ही देखने के लिए रह गया। पर काफी लोगो का पानी के पडाव अभी वही था वो कहते थे की रोजाना इस्तेमा के लिए पानी तो कही से भी भर ले पर पीने का पानी तो आपके यहाँ ही मिट्ठा आता है। जहाँ एक तरफ जिसका मकान था वो वो परेशान था की लोग पानी तो भर ले जाते है पर जभ हैड पम्म खआराब हो जाता है तो कोई ठिक नही करवाता तो दुसरी तरफ वो ते सोच के चुप रह जाता कि पानी पिलाना या भरवान पुन्य का काम है। बस यहाँ लोग आते और पानी भरते भरते अपनी दो दो बाते कर जाते। पर कहते है ना तबदिलियाँ बदलाव का ही रुप है। बदलाव तो स्वाभाविक है, हर चीज में बदलाव तो हमेशा चलता रहता है। इसी बदलाव के चलते हुए यहाँ घरो में सरकारी नलके पहुच गए जिसमे समत से पानी आता है। यहाँ पल दो पल की मुलाकाते अब थम गई है। सभी अपने अपने घरो में व्यस्त नजर आते है।
निजी सामुहिक में कब तबदिल हो जाता है पता ही नही चलता...
जीवन में सामुहिक जगह आपनी जगह आपना आस्तित कब बना लेती है पता ही नही चलता।धीरे-धीरे ये सामुहिकता एक ठोस रुप बनाती हुई जटीलता कि और कब कदम बना लेती है पता ही नही चलता। इसका अपना एक स्वतन्त्र आकार बनता चला जाता है। जो एक खूले मंच की तरह है। जहाँ सभी की आवाजाहीके अपने मायने होते है। और सभी का अपने अंदाज में बहना इसे और सुन्दर बना देता है। तहाँ सभी की चहलकदमी का अपना ही अंदाज होता है। हर किसी की चहलकदमी इसे एक नए सुप का आकार देती है। आर इसमे शामिल हो जाती है।
कई साल पहले एक बंजर जमीन पर इटो से एक आक्रति बनाने का काम चला और कुछ ही समय में इसने एक ठोस रुप लिया और कुछ लोगो ने आपनी आवाजाही से उसे मकान के रुप में ढाल दिया । ये मकान उस सामय बना था जब आँखो को दुर दुर तक ले जाने पर भी कुछ इका-दुक्का ही मकान दिखाई देते थे। वो भी साफ तौर पर नज़र आने में असर्मथ थे। कई किलोमीटर में गिनेचुने मकान ही दिखाई देते थे, ना कोई मकान और ना कोई दुकाने अगर थी भी तो काफी दुर जाना पढ़ता था । वहाँ रहने वाले कुछ लोग दैनिकता की हर चीज से परेशान थे, सभी चीजे उसकी पहुँच से बाहर थी। एसे में पानी की तंगी अलग । इस जगह बसावट बनाने वाले सभी लोगो को पता नही कहाँ कहाँ से पानी का जुगाड करना पढता था।
ऐसे में उस मकान में बसने वाले लोगो ने अपने घर की अधुरे बने मकान के बचे हए हिस्से पर एक हाथ से चलने वाला हैड पम्प लगवा लिया। ये उन्होने अपनी सुविधा के लिइ लगवाया था जिससे उन्हे कही और पानी के लिये नही जाना पड़े। इस हैड पम्प को उन्हिने अपनी सुविधा के लिए लगवाया था जो नीजी था। इससे उनकी परेशनी तो खत्म हुई पर लोगो ने भी वहा पानी भरना शुरु कर दिया। और धीरे-धीरे सभी लोगो को पानी भरने के लिऐ इस जगह का पता चल गया। अब यहाँ इस मकान के सामने हर समय कोई ना कोई पानी भरने के लिए अपने बर्तन लगाए रखता है। यहाँ ये नीजी से कब तबदिलियो में आकर सामुहिक बन गया पता नही चला। समय बितने के साथ साथ उनके आस पास का आकार भी बढ़ता गया, और आस पास मकानो के समुह ने जगह को भर दिया। गाँव के सभी लोग यहां आकर अपने दैनिक इस्तेमाल के लिए पानी भरा करते थे। और पानी भरते - भरते इद दौर के बीच आपस में कुछ इधर उधर की बाते भी हो जाती। एसा लगता की लोग अपने लिए समय निकालने आते हो। पुरे दिन मे कुछ समय एसा होता जब वो समाजिक हो जाते और सामाजिकता को जीने लगते। पर समय की तबदिलियो के साथ साथ एसे सामुहीक ठिकाने और बने जहाँ लोगो ने एसे ही हाथ से चलने वाले हैड पम्प और लगवा लिये कुछ घरो की चार दिवारी में नीजी ही रह गये और कुछ सामुहीक बनते चले गये। पर ये जगह धीरे धीरे चार दिवारी में सिमटने लगी सभी धीरे धीरे इसे अपने घरो मे करने लगे। पानी कि इस परेशानी को देखते हुए कुछ जगहो पर सरकारी हैडपम्प भी लगवाए पर ये ज्यादा दिन तक नही चलपाये क्योकी यहाँ पर देखबाल करने वाला कोई नही था। और ना ही इसके इस्तेमाल पर किसी का प्रतिबंध था ये जगह पुणतह: सामाजिक थी । जहाँ किसी के लिए रोक टोक की गुंजाइश नही थी सभी अपनी मर्जी के मालिक थे। ये जगह जब तक रह सकती थी रही बाद में इनका सिर्फ आकार ही देखने के लिए रह गया। पर काफी लोगो का पानी के पडाव अभी वही था वो कहते थे की रोजाना इस्तेमा के लिए पानी तो कही से भी भर ले पर पीने का पानी तो आपके यहाँ ही मिट्ठा आता है। जहाँ एक तरफ जिसका मकान था वो वो परेशान था की लोग पानी तो भर ले जाते है पर जभ हैड पम्म खआराब हो जाता है तो कोई ठिक नही करवाता तो दुसरी तरफ वो ते सोच के चुप रह जाता कि पानी पिलाना या भरवान पुन्य का काम है। बस यहाँ लोग आते और पानी भरते भरते अपनी दो दो बाते कर जाते। पर कहते है ना तबदिलियाँ बदलाव का ही रुप है। बदलाव तो स्वाभाविक है, हर चीज में बदलाव तो हमेशा चलता रहता है। इसी बदलाव के चलते हुए यहाँ घरो में सरकारी नलके पहुच गए जिसमे समत से पानी आता है। यहाँ पल दो पल की मुलाकाते अब थम गई है। सभी अपने अपने घरो में व्यस्त नजर आते है।
Tuesday, July 6, 2010
aakhri panna...
आखरी पन्ना...
मेरी कोपी का वो आखिरी पन्ना जो कभी आखिरी नही । मेरा वो पन्ना कई तरह के शब्दो से हमेशा भरा रहता है । कभी मैं उस पन्ने पर अपने नाम को अलग–अलग तरिको दर्ज करता था । अपने नाम के हस्ताक्षर को सजाने की कोशिश एक अभ्यास करता रहता अपने हस्ताक्षर को ज़टिल रुप देने का या अपने स्कुल की अगले दिन की छुट्टी के लिए एक अवकाश पत्र लिख उसे कापी से जुदा कर लेता वो पन्ना मेरे लिए कभी आखिरी नही था । कभी दोसतो के साथ मिलकर उसमे चित्रकारी करता और दोस्त उस पन्ने को भी उसमे से फाड़ कर अपने पास रख लेते । कभी पिछले पन्नो पर चार पर्ची खेलते या कभी अपने खेलो को दर्ज करते आने वाले पेपरो की डेटशिट कोभी उसी पन्ने में जगह मिलती । एक बार मैने उस पन्ने को दोस्तो के लवज़ो से निकली शायरी से भी सजाया । जिसको भी कभी कुछ लिखना होता पिछे के पन्ने पर ही लिख देता जिसको कोपी में संजोय रखना मेरे लिए आसान नही था क्योंकि वो पन्ना आखिरी नही था । कभी किसि सब्जेक्ट की कोपी भुल जाता तो पिछले पन्ने में उस कोपी का काम कर लेता और उसे फाड़ कर अपने पास रख लेता । घर के राशन कीलिस्ट बनानी होती तोभी वो ही पन्ना काम आता जो कभी आखिरी नही था । कोपी का आकार तो सिमटता जाता पर उस पन्ने का आकार वही था जिसमे मैं हमेशा कई चीजे शामिल किया करता था उसमे कभी किसी चीज़ को दर्ज करने के लिए कमी नही थी क्योंकि वो पन्ना कभी आखिरी था ही नही । कोपी भरने पर भी उसमे एक ऐसे पन्ने की तलाश थी जो आखिरी हो ही नही ।दोस्तो के कुछ लिखने के लिए पन्ना या कोपी माँगने पर कभौ ये नही कहा ये पन्ना आखिरी है क्योंकि कही न कही कोई न कोई जगह मिल ही जाती । 240 पन्नो की कोपी कब140पन्नो में तबदील हो जातौ पता नही चलता । पर इतना कुछ होने के बाद भी वो पन्ना कभी आखिरी नही था । बस वो पन्ना जगह बदल लेता था ।
मेरी कोपी का वो आखिरी पन्ना जो कभी आखिरी नही । मेरा वो पन्ना कई तरह के शब्दो से हमेशा भरा रहता है । कभी मैं उस पन्ने पर अपने नाम को अलग–अलग तरिको दर्ज करता था । अपने नाम के हस्ताक्षर को सजाने की कोशिश एक अभ्यास करता रहता अपने हस्ताक्षर को ज़टिल रुप देने का या अपने स्कुल की अगले दिन की छुट्टी के लिए एक अवकाश पत्र लिख उसे कापी से जुदा कर लेता वो पन्ना मेरे लिए कभी आखिरी नही था । कभी दोसतो के साथ मिलकर उसमे चित्रकारी करता और दोस्त उस पन्ने को भी उसमे से फाड़ कर अपने पास रख लेते । कभी पिछले पन्नो पर चार पर्ची खेलते या कभी अपने खेलो को दर्ज करते आने वाले पेपरो की डेटशिट कोभी उसी पन्ने में जगह मिलती । एक बार मैने उस पन्ने को दोस्तो के लवज़ो से निकली शायरी से भी सजाया । जिसको भी कभी कुछ लिखना होता पिछे के पन्ने पर ही लिख देता जिसको कोपी में संजोय रखना मेरे लिए आसान नही था क्योंकि वो पन्ना आखिरी नही था । कभी किसि सब्जेक्ट की कोपी भुल जाता तो पिछले पन्ने में उस कोपी का काम कर लेता और उसे फाड़ कर अपने पास रख लेता । घर के राशन कीलिस्ट बनानी होती तोभी वो ही पन्ना काम आता जो कभी आखिरी नही था । कोपी का आकार तो सिमटता जाता पर उस पन्ने का आकार वही था जिसमे मैं हमेशा कई चीजे शामिल किया करता था उसमे कभी किसी चीज़ को दर्ज करने के लिए कमी नही थी क्योंकि वो पन्ना कभी आखिरी था ही नही । कोपी भरने पर भी उसमे एक ऐसे पन्ने की तलाश थी जो आखिरी हो ही नही ।दोस्तो के कुछ लिखने के लिए पन्ना या कोपी माँगने पर कभौ ये नही कहा ये पन्ना आखिरी है क्योंकि कही न कही कोई न कोई जगह मिल ही जाती । 240 पन्नो की कोपी कब140पन्नो में तबदील हो जातौ पता नही चलता । पर इतना कुछ होने के बाद भी वो पन्ना कभी आखिरी नही था । बस वो पन्ना जगह बदल लेता था ।Friday, July 2, 2010
bachpan
बचपन लाना और बचपन टालना दोनो ही उम्र पर छोड दीया जाता है और बार - बार उसको बताया भी जाता है की तु अभी छोटा है या अब तु चौदह साल का जवान हो चुका है ! पर हर कोई बचपन में जीना चाहता है ! हर कोई अपने आप को बडा दिखाने की कोशिश करता है !
जैसे हमारे ही लैब में राजा है किसी से भी बात करता है तो बाबू जरुर बोलता है ! किसी का नाम न लैखर बाबू शब्द
कह देना या एसा कोई भी शब्द ईस्तमाल करना हम उस पर क्या जताना चाहते है की में तुझसे बडा हूँ ! या मेने देखा जब किसी कि लडाई हो जाती है ! तो लोग ये क्यो बोल दैते है जा बच्चा समझकर छोड दिया !
यानी कही न कही अपने आप को उससे बडा दिखाने की कोशिश करता है ! या दुसरो से कम्प्येर करना माँ - बाप हमेशा अपने बच्चो को दुसरो से कम्प्येर क्यो करते है ! कभी कोई कुछ भी करता है तो बारा बार बताते है की देख उसने क्या किया !
मै बडा हो चुका हूँ या बचपन मैं जी रहा हूँ ! बाहार के माहौल की समझ जैसे ही धीरे धीरे बनती जाती है , वैसे ही शायद बचपन भी औझल होते जाता है पर उस बचपन को अपने अन्दर कही न कही छुपा लेते है ! जैसे हर कोई आप को बडा बताना चाहता है , वैसे ही घर वाले भी हमें हमेशा अपनी नजरो में तो बच्चा ही समझेगें पर अपने अन्दर आप कहाँ तक समझते हो की आप बच्चे हो ये आप पर निर्भर
है !
जैसे की किसी ने बताया की एक बच्चे से उन्होने पुछा कि कहाँ जा रहा है ! उसने बडी शान से बताया की काम पर जा रहा हूँ !
शक्स ने कहा~ कितने कमाते हो !
उसने कहाँ 70-75 रू रोज , 25 रु आपने पास रखता हौँ बाकी घर में देता हूँ !
जो आपने काम से अपने घर वालो का पेट पाल रहा है उसे वो शक्स क्या कहते की तू अभी बच्चा है या तेरी इतनी उम्र
है पढाई कर काम क्यो कर रहा है ! और वो भी ये कहे अभी मैं बच्चा हूँ अभी में कर भी क्या सकता हूँ ! वो बच्चा भिख माँगने का काम करता है ! और कितनी शान से बोल पडा की काम पर जा रहा हूँ ! उसने दुनियाँ वालो के बीच ये रखा है
की उम्र कुछ नही सब अपने ऊपर निर्भर है ! लोगो को देखने का नजरिया क्या है उसके काम के साथ !
vicky
p.k.s
जैसे हमारे ही लैब में राजा है किसी से भी बात करता है तो बाबू जरुर बोलता है ! किसी का नाम न लैखर बाबू शब्द
कह देना या एसा कोई भी शब्द ईस्तमाल करना हम उस पर क्या जताना चाहते है की में तुझसे बडा हूँ ! या मेने देखा जब किसी कि लडाई हो जाती है ! तो लोग ये क्यो बोल दैते है जा बच्चा समझकर छोड दिया !
यानी कही न कही अपने आप को उससे बडा दिखाने की कोशिश करता है ! या दुसरो से कम्प्येर करना माँ - बाप हमेशा अपने बच्चो को दुसरो से कम्प्येर क्यो करते है ! कभी कोई कुछ भी करता है तो बारा बार बताते है की देख उसने क्या किया !
मै बडा हो चुका हूँ या बचपन मैं जी रहा हूँ ! बाहार के माहौल की समझ जैसे ही धीरे धीरे बनती जाती है , वैसे ही शायद बचपन भी औझल होते जाता है पर उस बचपन को अपने अन्दर कही न कही छुपा लेते है ! जैसे हर कोई आप को बडा बताना चाहता है , वैसे ही घर वाले भी हमें हमेशा अपनी नजरो में तो बच्चा ही समझेगें पर अपने अन्दर आप कहाँ तक समझते हो की आप बच्चे हो ये आप पर निर्भर
है !
जैसे की किसी ने बताया की एक बच्चे से उन्होने पुछा कि कहाँ जा रहा है ! उसने बडी शान से बताया की काम पर जा रहा हूँ !
शक्स ने कहा~ कितने कमाते हो !
उसने कहाँ 70-75 रू रोज , 25 रु आपने पास रखता हौँ बाकी घर में देता हूँ !
जो आपने काम से अपने घर वालो का पेट पाल रहा है उसे वो शक्स क्या कहते की तू अभी बच्चा है या तेरी इतनी उम्र
है पढाई कर काम क्यो कर रहा है ! और वो भी ये कहे अभी मैं बच्चा हूँ अभी में कर भी क्या सकता हूँ ! वो बच्चा भिख माँगने का काम करता है ! और कितनी शान से बोल पडा की काम पर जा रहा हूँ ! उसने दुनियाँ वालो के बीच ये रखा है
की उम्र कुछ नही सब अपने ऊपर निर्भर है ! लोगो को देखने का नजरिया क्या है उसके काम के साथ !
vicky
p.k.s
Relling se (ek lekh)
रेलिंग
बिजली जा चुकी थी हर घर चिराग से रोशन होने लगे थे ,समय भी करीब 8:00 बजे का था ,पसीने से शरीर चिपचिपाने लगा था कपड़े शरीर से चिपकनेपर मजबुर थे लोग बाग अपने घरो से बाहर निकलने लगे थे निगाहो को भी ये सभी नजारे देखने के लिए बढिया जगह मिल गई! शुरुआत में निगाहे कही जमने को ठहरने को तैयार ही नही ! निगाहे सामने की तरफ जाती तो छोटे छोटे बल्फ शहर को साफ उभार रहे है ! सभी रोशनीयाँ अधेरे में जगमगा रही है ! कभी पलकें झपकती कभी निगाहें पलटती और कभी नीचे जाती तो कभी नीचे का माहौल समय के साथ बदलता नज़र आता ! कहीं लोगों की भीड़ कहीं सन्नाटा, सड़कों पर आते-जाते लोग बाग और गाड़ियों के आने जाने पर आती आवाज़ें जैसे: माहौल के होने का एहसास दिलाती! गाड़ियों आने-जाने के एहसास का एहसास दूर से हो रहा था! इतने में निगाहों ने फिर करवट ली और कुछ परछाईयाँ दिखने लगी !
अंधेरे में जब कोई गाड़ी अपनी हेडलाईट की रोशनी उनके चेहरों पर डालता तो कुछ पल के लिए अपना अस्तित्व ले लेती और सामने आ जाती और पता चलता कि एक पेड़ के नीचे सात-आठ बुज़ुर्ग जिनकी उम्र ५५ सए ७० साल कि तो होगी वो कच्ची जमीन पर कुछ पत्थरों के सहारे लगे दो फट्टों पर आमने-सामने बैठकर अपनी महफिल सजाए बैठे हैं एक और शख़्स बिना बताए अपनी रेलिंग से उनकी महफिल में शरीक हो गया और उनके बोले हुए हर शब्द को सुनने लगा !
कभी वो अपनी बात को कहते तो कभी दुसरों की बताते तो कभी दुसरों की बात ध्यान से सुनते ! कभी किसी बात से ठहाके मारकर ज़ोर से हसते कभी गानों से महफिल को और हंसी बनाते !
अभी एक अंकल जी अपने घर के बारे में बता रहे थे कि उनके घर में सुबह-शाम चिल्लाना पुकारना शोर मचा रहता है ! इसलिए वओ यहाँ बैठने चले जाते हैं इतने में बगल मे बैठे अंकल जी ने कहा ..आजकल सभी घरों में यही हाल है ...तेरा घर कोई अनोखा कोई न है इतने में बात खत्म ही हुई थी कि तेज़ी से आवाज़ करती एक गाड़ी एकदम सामने आकर रुकीउसमें से ख़ाकी वर्दी पहनें दो शख़्स उतरे और गाड़ी में से एक लडके को उतार के डण्डों से पिटते हुए ले जा रहे थे !
गाड़ी से निकलती घुमती हुई रोशनी ने आस-पास के कुछ इलाके को अपने आगोश में ले लिया था! इतने में गाड़ी के पीछे-पीछे गली के लोग आ गए और अचानक शान्ति भरा माहोल शोर में बदल गया! सभी लोगों का ध्यान उधर ही था ! अपनी बातों को अधुरा छोड़ सभी लोगों का केन्द्र बिन्दु वो भड़कते हुए लोग थे ! इतने शोर में समझ नही आ रहा था
कि क्या हुआ ?
कदम अपने आप नीचे जाने को मजबूर हो गए और नीचे जाने पर पता चला कि दो लड़के आपस में लड़ पड़े और इस लड़के ने दूसरे का सिर फाड़ दिया फिर सवाल उठा कि दूसरा लड़का कहाँ है? लड़ाई तो दोनो मे हुई है ना ...
उसे क्यों नही पकड़ कर लाए वो अभी अस्पताल में है कुछ ज्यादा ही चोट आई है ! इतनी देर में कही से आवाज़ आई ये तो यहाँ रोज़ाना का काम है और इतने में ये गाना गाते हुए
"मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा
मिल गया होता अगर तूफां नही
आता किनारा मिल गया होता "
सभी उसी माहोल में वापिस आनए लगे,वक़्त अपनी रफ्तार से चलता ही जा रहा था और बिजली ने भी अन्धेरे को चीर दिया था ! लोगो के चेहर अब साफ तोर पर मेरी आँखो के सामने थे ! और सब घरो को रव़ाना होने लगे थे !अब निगाहे घड़ी पर पड़ी और अब समय था 9:35 पता नही वक्त इतनी जल्दी कैसे गुजर गया ! अभी आठ ही तो बजे थे जब निगाहो ने अपना खेल खेलना शुरु किया था ! कही घड़ी तो जल्दी नही चलने लगी !
इतना सोचते ही फिर निगाहे वापस वही गई तो देखा वहिँ अब कोई नही था ! बस वही अकंल बैठे थे जिनका वो
मकान था ओर उनकी यादें ... अभी थोड़ी देर पहले अपने दोस्तो के साथ महफिल संजोय बैठे थे अकंल अभी भी शायद
अकेले नही क्योंकी वो यादें उनके साथ है जिनहे वो कभी भी दोहरा सकते है ! क्योंकी यादे ही इन्सान का सबसे अच्छा दोस्त है जो हमेशा साथ रहता है ! सन्जू मेरा बड़ा भाई भी कहता है की जब भी तु अकेला उदास बैठा हो अपने आप को अकेला मत समझीयों क्योंकी तेरे पास सबसे अच्छा दोस्त है !
तेरी यादें बस जरुरत है flash back में जाने की मुस्कुराहट अपने आप ही दस्तक दे देगी !
pks
vicky
बिजली जा चुकी थी हर घर चिराग से रोशन होने लगे थे ,समय भी करीब 8:00 बजे का था ,पसीने से शरीर चिपचिपाने लगा था कपड़े शरीर से चिपकनेपर मजबुर थे लोग बाग अपने घरो से बाहर निकलने लगे थे निगाहो को भी ये सभी नजारे देखने के लिए बढिया जगह मिल गई! शुरुआत में निगाहे कही जमने को ठहरने को तैयार ही नही ! निगाहे सामने की तरफ जाती तो छोटे छोटे बल्फ शहर को साफ उभार रहे है ! सभी रोशनीयाँ अधेरे में जगमगा रही है ! कभी पलकें झपकती कभी निगाहें पलटती और कभी नीचे जाती तो कभी नीचे का माहौल समय के साथ बदलता नज़र आता ! कहीं लोगों की भीड़ कहीं सन्नाटा, सड़कों पर आते-जाते लोग बाग और गाड़ियों के आने जाने पर आती आवाज़ें जैसे: माहौल के होने का एहसास दिलाती! गाड़ियों आने-जाने के एहसास का एहसास दूर से हो रहा था! इतने में निगाहों ने फिर करवट ली और कुछ परछाईयाँ दिखने लगी !
अंधेरे में जब कोई गाड़ी अपनी हेडलाईट की रोशनी उनके चेहरों पर डालता तो कुछ पल के लिए अपना अस्तित्व ले लेती और सामने आ जाती और पता चलता कि एक पेड़ के नीचे सात-आठ बुज़ुर्ग जिनकी उम्र ५५ सए ७० साल कि तो होगी वो कच्ची जमीन पर कुछ पत्थरों के सहारे लगे दो फट्टों पर आमने-सामने बैठकर अपनी महफिल सजाए बैठे हैं एक और शख़्स बिना बताए अपनी रेलिंग से उनकी महफिल में शरीक हो गया और उनके बोले हुए हर शब्द को सुनने लगा !
कभी वो अपनी बात को कहते तो कभी दुसरों की बताते तो कभी दुसरों की बात ध्यान से सुनते ! कभी किसी बात से ठहाके मारकर ज़ोर से हसते कभी गानों से महफिल को और हंसी बनाते !
अभी एक अंकल जी अपने घर के बारे में बता रहे थे कि उनके घर में सुबह-शाम चिल्लाना पुकारना शोर मचा रहता है ! इसलिए वओ यहाँ बैठने चले जाते हैं इतने में बगल मे बैठे अंकल जी ने कहा ..आजकल सभी घरों में यही हाल है ...तेरा घर कोई अनोखा कोई न है इतने में बात खत्म ही हुई थी कि तेज़ी से आवाज़ करती एक गाड़ी एकदम सामने आकर रुकीउसमें से ख़ाकी वर्दी पहनें दो शख़्स उतरे और गाड़ी में से एक लडके को उतार के डण्डों से पिटते हुए ले जा रहे थे !
गाड़ी से निकलती घुमती हुई रोशनी ने आस-पास के कुछ इलाके को अपने आगोश में ले लिया था! इतने में गाड़ी के पीछे-पीछे गली के लोग आ गए और अचानक शान्ति भरा माहोल शोर में बदल गया! सभी लोगों का ध्यान उधर ही था ! अपनी बातों को अधुरा छोड़ सभी लोगों का केन्द्र बिन्दु वो भड़कते हुए लोग थे ! इतने शोर में समझ नही आ रहा था
कि क्या हुआ ?
कदम अपने आप नीचे जाने को मजबूर हो गए और नीचे जाने पर पता चला कि दो लड़के आपस में लड़ पड़े और इस लड़के ने दूसरे का सिर फाड़ दिया फिर सवाल उठा कि दूसरा लड़का कहाँ है? लड़ाई तो दोनो मे हुई है ना ...
उसे क्यों नही पकड़ कर लाए वो अभी अस्पताल में है कुछ ज्यादा ही चोट आई है ! इतनी देर में कही से आवाज़ आई ये तो यहाँ रोज़ाना का काम है और इतने में ये गाना गाते हुए
"मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा
मिल गया होता अगर तूफां नही
आता किनारा मिल गया होता "
सभी उसी माहोल में वापिस आनए लगे,वक़्त अपनी रफ्तार से चलता ही जा रहा था और बिजली ने भी अन्धेरे को चीर दिया था ! लोगो के चेहर अब साफ तोर पर मेरी आँखो के सामने थे ! और सब घरो को रव़ाना होने लगे थे !अब निगाहे घड़ी पर पड़ी और अब समय था 9:35 पता नही वक्त इतनी जल्दी कैसे गुजर गया ! अभी आठ ही तो बजे थे जब निगाहो ने अपना खेल खेलना शुरु किया था ! कही घड़ी तो जल्दी नही चलने लगी !
इतना सोचते ही फिर निगाहे वापस वही गई तो देखा वहिँ अब कोई नही था ! बस वही अकंल बैठे थे जिनका वो
मकान था ओर उनकी यादें ... अभी थोड़ी देर पहले अपने दोस्तो के साथ महफिल संजोय बैठे थे अकंल अभी भी शायद
अकेले नही क्योंकी वो यादें उनके साथ है जिनहे वो कभी भी दोहरा सकते है ! क्योंकी यादे ही इन्सान का सबसे अच्छा दोस्त है जो हमेशा साथ रहता है ! सन्जू मेरा बड़ा भाई भी कहता है की जब भी तु अकेला उदास बैठा हो अपने आप को अकेला मत समझीयों क्योंकी तेरे पास सबसे अच्छा दोस्त है !
तेरी यादें बस जरुरत है flash back में जाने की मुस्कुराहट अपने आप ही दस्तक दे देगी !
pks
vicky
Thursday, December 31, 2009
likhne ke liye bahut kuch he yahi soch lekar mea kuch likhta hu or aapki is blog ki duniya mea shamil hua hu.
aaj shuruaat karta hu apne baare se. mera naam vicky he. kuch likhkar logo ke pich rakhne ki shuruwaat mene ankur se ki or likhna or sunna or sunnana meri jindgi mea shaamil ho gaya . ab jaha mehkma tyaar hota he wahi sunney sunane ki mehfile banne lagti he. mene is likhne likhane ki prakriya ke saath bahut kuch kiya magar ab mea ai ngo mea nahi hu. par likhne ka ye josh or jigyaasa mujhme ab bhi kayam he jaha kalpanao ki ye duniya bhi mera saath deti he. shuruwaat hamesha mere haath mea hoti he par ant mujhe bhi apne saath baha le jaati he.
aaj ke liye itna hi ...
sabhi likhne,padne or sunney waalo ko meri taraf se khuda hafij phir milenge apni kisi rachna ke saath...
aaj ke liye itna hi ...
sabhi likhne,padne or sunney waalo ko meri taraf se khuda hafij phir milenge apni kisi rachna ke saath...
Subscribe to:
Comments (Atom)