Wednesday, February 2, 2011

आज कलम से...


आज कलम से...

आज कलम उठाई,

नज़रे टेबल पर रखी कापी पर जमाई ।

और सोचा लिख ड़ालु,

दो-चार पन्ने मैं भी भाई ।


फिर सोचा क्या लिखुं,

सपना फिर या संसार लिखुं ।


फिर एसा लिखने को सोचा,

जो सबसे ही अलग हो ।

ना झुठ हो ना सच,

बस कल्पना कि झलक हो ।


कलम को घिसने लगा तो सोचा,

क्या लिखना इतना आसान है ।

मुर्दा शब्दो के रूप में,

कापी पर भी बना शमशान है ।


फिर नज़रो को बन्द किया,

और जोड़ दिया कुछ शब्दो को ।

जब दोहराया अपने में,

तो समझ ना आने पर वो पन्ना भी फाड़ दिया ।


इस लिखने, समझने की प्रक्रियां में,

कई पन्नो को बली चढ़ा ड़ाला ।

लिखने को कुछ ना मिला,

इस कविता को ही बना ड़ाला ।